Posts

Rewind - January 2023

 I can't believe January is over. It went by like a whoosh. I am writing better than what I did in the last quarter of 2022. I want to write more long-form Hindi poems this year. I wrote the following in January: Date Published 01/03/2023 देने वाले ने रिश्ता खत्म होने का  क्या सिगनल दिया  आज वह नाराज़ मुझ से था  और गुस्सा किसी और पे किया  Dene wale ne rishta khatam hone ka Kya signal diya Aaj woh naraaz mujh se tha Par gussa kisi aur pe kiya 01/09/2023 There is more strength in me Than there is stress There is more beauty in my vulnerability Than in my 100-dollar dress Them f**kers can't rule me They try nevertheless Honest to God truth - When a man can't handle a strong woman He often calls her a mess 01/15/2023 वो जो नस-नस में आग लगाती है तुम वो बुरी आदत हो 01/19/2023 ​​तेरे शहर से गुज़रु और तू याद भी ना आए  बस इतना भूलना है तुझे Tere shehar se guzaru aur tu yaad bhi na aaye Bas itna bhulna hai tujhe

Music and I are in a relationship

Image
Music is my 19-year-old boyfriend who picked me up from college and took me to a different restaurant every Saturday - and - tucked my hair behind my ear as I ate sizzler. Music is also the sauve man I dated who listened to my 5-year plan - feeding my soul and body with a penetrating stare and his to-die-for smile. Music is also the man who betrayed me and left me in the lurch - and - made me fall every time I tried to take a step forward. Music is love, lust and betrayal all rolled into one. I have lived more in the songs I have listened to than through the highs and lows of life. In the dead of winter last January, I missed my bus and had to wait for another bus for 40 minutes in -15 degrees celsius. I shivered in sub-zero weather. With anger seething in my body, warmth was given by Ed Sheeran's Beautiful People . I wondered was Ed was singing for me? Because I don't fit in this world. Because, at that time, I could definitely use some help. Perhaps a ride. Perhaps enough mo

I'm a mess

Image

मुझे तुम्हारी सादगी पसंद आई

Image
  तुम किसी बड़े शहर की बड़ी इमारत और मैं नुक्कड़ वाली पान की दुकान तुम्हें महँगी चीज़े पसंद हैं और मेरे पास है चवन्नी-अठन्नी का सामान फिर भी तुम मुझे देखते हो कुछ तो बात होगी मुझमें और भी कई आशिक़ है मेरे  ज़्यादा इतराना मत ख़ुद पे बस ये दिल साला बीड़ी सा सुलगता है जो तुझे एक बार देख लूँ  समझ नहीं आता अपने छोटे बजट में क्या तोहफ़ा तुम्हें भेज दूँ 
 इश्क़ बहुतो को ले डूबा हैं अब मैं कैसे किनारा करूँ तुझसे जो नैन लगाये हैं दिल कहता है ये कांड मैं दोबारा करूँ 
 उँगलियों पे गिनती हूँ मैं घंटे फ़ोन पे लगाती हूँ अलार्म हाय, मैं रही मॉडर्न डे मीरा तुम किसन कन्हैया घनश्याम 
 आओ कभी हमारी गली दिन, तारीख़, मौसम मत देखना सरप्राइज सा देना मुझे आने की खबर भी ना भेजना 
 तुम जैसे अमीर से मुझ जैसे गरीब ने दिल लगाया है  जितना तुम्हारा दिन का खर्चा है  उतना मेरा पाँच महीने का किराया है  
 पर इश्क़ पैसा नहीं देखता ना देखता है औक़ात  मुझे तुम्हारी सादगी पसंद आई काश तुम्हें भी पसंद हो मेरी कोई बात

Rewind - December 2022

  2022 is finally done and dusted. It was a year which has shaped me into a different person. I hope this journey continues into 2023. I wrote very less in December. I was travelling and was very busy till December 29th. Date Published 12/13/2022 सबसे बड़ा घाटा ये है कि  जो इंसान आपको दो पैसे की इज़्ज़त नहीं देता उसपे आप ज़िन्दगी के घंटों बर्बाद करते हो 12/18/2022 शिद्दत और इश्क़ से मिलना होता तो कब के मिल जाते अब तुझे पाने की उम्मीद मैंने क़िस्मत पे छोड़ दी है 12/20/2022 जो लोग हालात के आगे नहीं झुकते उन्हें दुनिया क्या झुकाएगी Wish you all a very happy new year! Saru

Rewind - November 2022

  Oh, the last month of 2022. What a year it was! I finally finished my book. Looking forward to next year! I wrote the following in November.   Date Published 11/03/2022 दर्द की सिर्फ इतनी सी परिभाषा  ना दिल में सुकून, ना चैन, ना कोई आशा 11/10/2022 अक्सर बड़े शहरों में लोग वजूद ढूढ़ने आते है  पर खुद को कब खो बैठते है उन्हें पता भी नहीं चलता Aksar bade shehron mein log wajood dhoondne aate hai Par khud ko kab kho baithate hai unhe pata bhi nahi chalta 11/15/2022 अकेलापन से डर नहीं लगता डर लगता है उस तन्हाई से जिसमें तुम्हारी यादें दबे पाँव आ जाती है  Akelepan se darr nahi lagta Darr lagta hai us tanhai se jisme tumhari yaadein dabe paon aa jaati hain 11/28/2022 कोई अपना ही रहा होगा  इतना दुःख देने की हैसियत किसी पराये की नहीं हो सकती Koi apna hi raha hoga Itna dukh dene ki haisiyat kisi paraye ki nahi ho sakti ​​किसी और से बात कर लूँ तो गज़ भर शक़ करता है वो बात अलग है हरामी मुझे अपना प्यार कहने से डरता है Kisi aur se baat kar lun Toh gaz-bhar shaq karta hai Woh baat alag hai haraami M

Rewind - October 2022

I think writing poetry has taken a backseat for a while. I have re-written my book this year. Editing is still a challenging task, though. I started doing other things - I ventured into making reels and I did my free Webinar last Saturday. Both of these have been creatively satisfying. But still I want to write more Hindi couplets. The reason is if I am out of practice, it gets difficult to sum up emotions in 2 lines. God willing, in November I will write more. This is what I wrote in October: Date Published 10/16/2022 तुम्हारी आदत चाय सी है  कमबख़्त कितनी भी कोशिश कर लूँ छूटती ही नहीं 10/18/2022 तुम नँगे पाँव किनारे पर क्या चली सुलगती रेट में उफान आ गया घर वाले करते है हर बात पे पैसे की बात अपने घर में महसूस होती है मुझे अब फकीरो सी औकात फ़कीरियत सी महसूस होती है अपने ही घर में मुझे जब घर वाले बात बात पे पैसे की बात करते है जब घर वाले बात बात पे पैसे की बात करते है अपने ही घर में फ़कीरियत सी महसूस होती है मुझे आज तक किसी से कुछ नहीं लिया पर तुझसे बार बार इश्क़ मांगता हूँ ये महज़ दिल्लगी न