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वो 90 के दशक की आशिक़ी

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  वो पीले फूलों का बाग़ वो हल्के रंगो की शाम  तुम वही मिलना मुझसे  जिस मोड़ पे आख़िरी बार लिया था मेरा नाम इत्तेफ़ाक़ से मिले थे हम और शिद्दत से निभाया था हमने प्यार कहाँ वो 90 के दशक की आशिक़ी और कहाँ आजकल का हैशटेग-वैशटेग सा व्यापार दिन गुज़ारे थे साथ हमने  बांधा था सपनों का संसार कब सोचा था मैंने कि मैं रह जाऊँगी दिल्ली में और तुम बस जाओगे सात समुंदर पार  सुना है वहाँ बर्फ गिरती है खूब  लोग वहाँ चाय कम कॉफ़ी ज़्यादा पीते हैं  और यहाँ चाय की हर एक चुस्की पे जनाब कॉलेज के दिनों को हम लाखों बार जीते हैं  बहुत उधेड़ बून करती हूँ मैं बहुत सोचती हूँ तुम्हारे बारे में  तुम काफ़ी आगे बढ़ गाये और मैं रह गई किनारे पे  खनक आज भी है  तेरी मद्धम सी आवाज़ की ज़िंदा मेरी बचकानी बातों पे  तुमने नहीं किया था मुझे कभी शर्मिंदा  रेत से थे तुम  तुम्हें मुट्ठी में बांध नहीं पाई कहाँ सागर, कहाँ साहिल  और ये हज़ार मीलों की जुदाई सुना है तुम दिसंबर में आ रहे हो हर बार की तरह 4 हफ़्ते के लिए तुम हमेशा लाते हो महंगे तोहफे  और मैंने तुम्हे सिर्फ ताने ही दिए  क्या कोई नाम है इस रिश्ते का  क्या कोई हक़ है मेरा

Rewind - August 2022

I have not been very productive for a month now. But I am having a good time with my nephew. It's fun and insightful to watch a baby grow. There is so much adults can learn from them. I wrote only 2 couplets in August. Date Published 08/17/2022 वक़्त बदलते ही जो बदल जाए  ऐसे दोस्तों को बदल देना चाहिए  08/30/2022 कितना बड़ा धोखा मिला होगा उसे कि वो इश्क़ के नाम पे तिलमिला जाता है Hoping September will be a hell lot productive in terms of creative writing. Love, Saru