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तुम ठहराव हो...

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कस्तूरी सी सुबह  सतरंगी सी शाम  दिल की तंग गलियों में  लिखा तेरा नाम 
कोई भी सीढ़ी हो तुम उसके पहले पड़ाव हो  ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में  तुम ठहराव हो 
रहूँ साथ तेरे उम्र भर  ऐसी खवाहिशनहीं मेरी जेहन में रखना कुछ ऐसी तलब है तेरी 
नशा उतरे न कभी  वैसी उम्दा शराब हो  ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में  तुम ठहराव हो 
लगे मीठी फरवरी में  वो सौंधी-सौंधी धुप तुम  श्रृंगार करूँ लाखों के  पर मेरा रूप तुम 
गुनगुनाओ जिसे दिन-रात  तुम वो अलाप हो  ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में  तुम ठहराव हो

बस अकेलापन कुछ यूँ मुझे सताता है...

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शाम के बाद घड़ी चलती है,
पर वक़्त ठहर जाता है,
बस अकेलापन,
कुछ यूँ मुझे सताता है!

दिल बहलाने के लिए,
चाय में अदरक डाली,
पर हर घूँट में,
तेरा बिस्कुट डुबोना याद आता है!
बस अकेलापन,
कुछ यूँ मुझे सताता है!

सोचा कैद करूँ,
ढलते सूरज के नायाब रंग,
फ़ोन के वॉलपेपर पे तेरी तस्वीर देख,
दिल सहम जाता है!
बस अकेलापन,
कुछ यूँ मुझे सताता है!

कभी बातें करती हूँ दोस्तों से,
संभालने के लिए,
पर तुम होते तो खामोशी भी सुनते,
यह सोच मन बिखर जाता है!
बस अकेलापन,
कुछ यूँ मुझे सताता है!

करवटें बदलती हूँ रात भर,
रात भर देखती हूँ घड़ी को,
तुम किसी और के बिस्तर पे हो,
यह ख्याल अंदर तक खोखला कर जाता है!
बस अकेलापन,
कुछ यूँ मुझे सताता है,
शाम के बाद घड़ी तो चलती है,
बस वक़्त ठहर जाता है!