Rewind - October 2022

I think writing poetry has taken a backseat for a while. I have re-written my book this year. Editing is still a challenging task, though. I started doing other things - I ventured into making reels and I did my free Webinar last Saturday. Both of these have been creatively satisfying. But still I want to write more Hindi couplets. The reason is if I am out of practice, it gets difficult to sum up emotions in 2 lines. God willing, in November I will write more.

This is what I wrote in October:




तुम्हारी आदत चाय सी है 

कमबख़्त कितनी भी कोशिश कर लूँ छूटती ही नहीं


तुम नँगे पाँव किनारे पर क्या चली

सुलगती रेट में उफान आ गया

घर वाले करते है हर बात पे पैसे की बात

अपने घर में महसूस होती है मुझे अब फकीरो सी औकात

फ़कीरियत सी महसूस होती है अपने ही घर में मुझे

जब घर वाले बात बात पे पैसे की बात करते है

जब घर वाले बात बात पे पैसे की बात करते है

अपने ही घर में फ़कीरियत सी महसूस होती है मुझे

आज तक किसी से कुछ नहीं लिया

पर तुझसे बार बार इश्क़ मांगता हूँ

ये महज़ दिल्लगी नहीं है मोहतरमा

इतना मैं जानता हूँ


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