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Showing posts with the label Hindi Poems

कहने की हिम्मत कहाँ से लाऊँ

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कुछ तो होगा तेरे मेरे बीच यूँही बिना मिले दिलों के तार नहीं छिड़ते पतझड़ में भी वक़्त से पहले पत्ते शाखों से नहीं बिछड़ते तुम कहोगे अकेलापन वजह है मैं कहूँगी शायद कुछ और बस मान लो एक बात कि तुम सुकून से लगते हो बाकी सब लगता है मुझे शोर तुम्हें उम्र भर इश्क़ नहीं मिला तुम्हें यह गिला है फ़र्ज़ निभाते-निभाते ज़िंदगी यूँही कट गई हम दोनों का यही सिलसिला हैं मुझे रत्ती भर इश्क़ तो मिला पर उससे बड़ा धोखा सारी ज़िंदगी इसी उम्मीद में रही मेरी क़िस्मत में भी कोई तुमसा होगा बस तकदीरों का खेल कह लो यह ज़िंदगी मुझे रास नहीं आई तुम कही हो तो सही पर तेरे-मेरे बीच मीलों लंबी जुदाई शायद कभी फ़र्क़ पड़ना बंद हो जाएगा तब तक के लिये गुज़ार लेते है तुम व्हाट्सएप पे मेसेज भेजते रहना यूँही तुम्हारी बातों पे हम खुश हो लेते हैं वैसे इससे ज़्यादा की उम्मीद करती हूँ पर कह नहीं पाऊँगी तुम्हारे साथ वक़्त गुज़ारना चाहती हूँ पर हिम्मत कहाँ से लाऊँगी *I am striving to make amends for the fact that I failed to compose even a single couplet throughout the month of May.

मुझे तुम्हारी सादगी पसंद आई

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  तुम किसी बड़े शहर की बड़ी इमारत और मैं नुक्कड़ वाली पान की दुकान तुम्हें महँगी चीज़े पसंद हैं और मेरे पास है चवन्नी-अठन्नी का सामान फिर भी तुम मुझे देखते हो कुछ तो बात होगी मुझमें और भी कई आशिक़ है मेरे  ज़्यादा इतराना मत ख़ुद पे बस ये दिल साला बीड़ी सा सुलगता है जो तुझे एक बार देख लूँ  समझ नहीं आता अपने छोटे बजट में क्या तोहफ़ा तुम्हें भेज दूँ 
 इश्क़ बहुतो को ले डूबा हैं अब मैं कैसे किनारा करूँ तुझसे जो नैन लगाये हैं दिल कहता है ये कांड मैं दोबारा करूँ 
 उँगलियों पे गिनती हूँ मैं घंटे फ़ोन पे लगाती हूँ अलार्म हाय, मैं रही मॉडर्न डे मीरा तुम किसन कन्हैया घनश्याम 
 आओ कभी हमारी गली दिन, तारीख़, मौसम मत देखना सरप्राइज सा देना मुझे आने की खबर भी ना भेजना 
 तुम जैसे अमीर से मुझ जैसे गरीब ने दिल लगाया है  जितना तुम्हारा दिन का खर्चा है  उतना मेरा पाँच महीने का किराया है  
 पर इश्क़ पैसा नहीं देखता ना देखता है औक़ात  मुझे तुम्हारी सादगी पसंद आई काश तुम्हें भी पसंद हो मेरी कोई बात

वो 90 के दशक की आशिक़ी

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  वो पीले फूलों का बाग़ वो हल्के रंगो की शाम  तुम वही मिलना मुझसे  जिस मोड़ पे आख़िरी बार लिया था मेरा नाम इत्तेफ़ाक़ से मिले थे हम और शिद्दत से निभाया था हमने प्यार कहाँ वो 90 के दशक की आशिक़ी और कहाँ आजकल का हैशटेग-वैशटेग सा व्यापार दिन गुज़ारे थे साथ हमने  बांधा था सपनों का संसार कब सोचा था मैंने कि मैं रह जाऊँगी दिल्ली में और तुम बस जाओगे सात समुंदर पार  सुना है वहाँ बर्फ गिरती है खूब  लोग वहाँ चाय कम कॉफ़ी ज़्यादा पीते हैं  और यहाँ चाय की हर एक चुस्की पे जनाब कॉलेज के दिनों को हम लाखों बार जीते हैं  बहुत उधेड़ बून करती हूँ मैं बहुत सोचती हूँ तुम्हारे बारे में  तुम काफ़ी आगे बढ़ गाये और मैं रह गई किनारे पे  खनक आज भी है  तेरी मद्धम सी आवाज़ की ज़िंदा मेरी बचकानी बातों पे  तुमने नहीं किया था मुझे कभी शर्मिंदा  रेत से थे तुम  तुम्हें मुट्ठी में बांध नहीं पाई कहाँ सागर, कहाँ साहिल  और ये हज़ार मीलों की जुदाई सुना है तुम दिसंबर में आ रहे हो हर बार की तरह 4 हफ़्ते के लिए तुम हमेशा लाते हो महंगे तोहफे  और मैंन...

यूँ दो चार घंटे के लिए नहीं

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फ़ुर्सत में मिलना मुझसे यूँ दो चार घंटे के लिए नहीं  सिर्फ़ हाल चाल नहीं पूछना बातें करनी है तुमसे कई देखना है तुम्हें एक टक शिकवे करने है तुमसे कई हज़ार जब नाराज़ हुए थे तुम मुझसे और जब छेड़ा था मुझे बीच बाज़ार चवन्नी-अठन्नी सा ढोंग मत करना मान लेना मेरे हर कहे को सुबकियाँ से काम मत चलाना बेहने देना ग़र आँसू बेहे तो  सख़्त होने का दिखावा छोड़ आना नुक्कड़ वाले बनिये की दुकान पे सिद्दत से एक बार बोल देना  कि गलती होती है इंसान से तुम मुझे छोड़ गए उसका तुम्हें कभी अफ़सोस हुआ है क्या मैं नहीं तुमसे पूछूँगी  कि मेरे बाद मेरी तरह किसी को छुआ है क्या  ना मैं इस युग की मीरा हूँ  ना हो तुम मेरे घनश्याम बस इश्क़ है तुमसे बेपन्नह मुझे बाक़ी सब कुछ है मुझमें आम  तुम भी सोचते होगे ना  यह तीली सा इश्क़, ज्वालामुखी कब हुआ यूँ समझ लो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे ख़याल ने दिन में 100 बार मुझे छुआ अब गणित में तो तुम अव्वल हो हिसाब लगा ही लोगे पर सोच के आना जनाब  पिछले 15 सालों का हिसाब कैसे दोगे  तो आना बस फ़ुरसत में  यूँ दो चार घंटे के लिए नहीं...

शहर में एक अफवाह सी है, कि आज भी तुझे मेरी परवाह सी है!

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शहर में एक अफवाह सी है  कि आज भी तुझे मेरी परवाह सी है वो घर जहाँ घंटों बिताए थे साथ हमने उसे छोड़ने की मेरे पास अब लाखों वजह सी हैं कि आज भी तुझे मेरी परवाह सी है खाली सी साँझों में देखते है लौटते हुए परिंदों को पर इस भरी दुनिया में क्या मेरे लिए कोई जगह भी है क्यों आज भी  तुझे मेरी परवाह सी है क्यों नहीं रह सके  साथ हम उम्र भर  यही सोच सोच ज़िन्दगी  तबाह सी है  फिर क्यों तुझे मेरी परवाह सी है शहर में एक अफवाह सी है  कि आज भी तुझे मेरी परवाह सी है

ख़ूबसूरत हो, ख़ूबसूरत सा दगा देते हो...

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I have written a few #songs. Thought of sharing songs that are rejected by #musicians on social media and blog. If anyone wants to compose it, please reach out at contact@sarusinghal.com. Here it goes... मीठे लगते हो पर हो तुम ज़हर ठहरी में साहिल सी   तुम तेज़ कोई लहर मेरे अंदर की आग को कुछ ऐसे हवा देते हो   ख़ूबसूरत हो ख़ूबसूरत सा दगा देते हो   ख़बर फैलें मोहल्ले में   बदनाम हो हम भी   बीते शामें साथ   आधी रात वापिस आऊँ मैं कभी बिस्तर पे सिलवटें हो   उन सिलवटों पे ये कहते हो   ख़ूबसूरत हो ख़ूबसूरत सा दगा देते हो   बेनाम हो रिश्ता हमारा तबाही को क्यूँ नाम दे अधूरे लाखों है यहाँ एक - दूसरे को क्यूँ इलज़ाम दे बनूँ मैं घाट सी तुम नदी सा मुझमें बहते हो   ख़ूबसूरत हो ख़ूबसूरत सा दगा देते हो #baawri_basanti #writer #hindi 

Rewind - March 2021

 I'm very happy when I write. So you all can guess how my March was! Hopefully, April will be better. Date Published 03/05/2021 तुम किसी मौड़ पे थाम लो शायद मेरा हाथ  बस यही सोच-सोच मचल जाती है उँगलियाँ 03/14/2021 There are 2 kinds of wounds. One gives you the ability to bear all kinds of pain. The other takes away your ability to love again.

Rewind - February 2021

I'm growing in leaps and bounds. This growth is worth more than money can ever buy. I'm rediscovering myself. Those who know me before 2008 would say I am going back to my original self. Without divulging the boring details, I'm in a space where I have wanted to be since 2018. I'm more confident, calm and focused. I'm looking forward to what life has in store for me this year. To all those who stood by me, left me, betrayed me, helped me - thank you for giving me life-changing lessons free of cost! And here's what wrote in February 2021. So less, I know! Date Published 02/01/2021 आज लफ्ज़ शर्मिंदा हुए  चुप्पी ने वो कमाल किया 02/10/2021 रुक-रुक के देखते है लोग अब इश्क़ ऐसे जिंदगी तबाह कर के गया 02/10/2021 In a room full of 100 people, if you are not there, it feels empty. 02/10/2021 You are my favourite kind of person - a little mad and a lot of fun. 02/15/2021 पास होने से ज्यादा दूरियों का एहसास दिलाती है वो नज़दीकियाँ जिनमे चुप्पी भरी होती है 02/16/2021 मोहब्ब...

तुम ठहराव हो...

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कस्तूरी सी सुबह  सतरंगी सी शाम  दिल की तंग गलियों में  लिखा तेरा नाम  कोई भी सीढ़ी हो तुम उसके पहले पड़ाव हो  ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में  तुम ठहराव हो  रहूँ साथ तेरे उम्र भर  ऐसी खवाहिश नहीं मेरी जेहन में रखना कुछ ऐसी तलब है तेरी  नशा उतरे न कभी  वैसी उम्दा शराब हो  ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में  तुम ठहराव हो  लगे मीठी फरवरी में  वो सौंधी-सौंधी धुप तुम  श्रृंगार करूँ लाखों के  पर मेरा रूप तुम  गुनगुनाओ जिसे दिन-रात  तुम वो अलाप हो  ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में  तुम ठहराव हो 

बस अकेलापन कुछ यूँ मुझे सताता है...

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शाम के बाद घड़ी चलती है, पर वक़्त ठहर जाता है, बस अकेलापन, कुछ यूँ मुझे सताता है! दिल बहलाने के लिए, चाय में अदरक डाली, पर हर घूँट में, तेरा बिस्कुट डुबोना याद आता है! बस अकेलापन, कुछ यूँ मुझे सताता है! सोचा कैद करूँ, ढलते सूरज के नायाब रंग, फ़ोन के वॉलपेपर पे तेरी तस्वीर देख, दिल सहम जाता है! बस अकेलापन, कुछ यूँ मुझे सताता है! कभी बातें करती हूँ दोस्तों से, संभालने के लिए, पर तुम होते तो खामोशी भी सुनते, यह सोच मन बिखर जाता है! बस अकेलापन, कुछ यूँ मुझे सताता है! करवटें बदलती हूँ रात भर, रात भर देखती हूँ घड़ी को, तुम किसी और के बिस्तर पे हो, यह ख्याल अंदर तक खोखला कर जाता है! बस अकेलापन, कुछ यूँ मुझे सताता है, शाम के बाद घड़ी तो चलती है, बस वक़्त ठहर जाता है!

I had my first epiphany this February

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February was life-changing. I had my first epiphany this month. In the first week of February, after hitting another low in life, I wanted to give up everything. But because I'm stubborn, I thought of giving it another try. I wrote what I wanted from life on a piece of paper. Then I did what I do best - I planned. I made a daily routine in which I included the activities to bring me closer to my goals. ( By the way, my goals are to have peace of mind, attain happiness in things I have, and live a simple and meaningful life.) And most importantly, I made an effort to delete what was toxic or unnecessary. This is what I changed: I kicked off all the negative and bad influences - people, food, circumstances. I don't log into Facebook as I don't get positive vibes from it. I'm being picky with food and exercising portion control. But the challenge was to kick-off bad circumstances as they are never under our control.  The best way, in my opinion, to deal with a bad...

It's All About Hindi This January

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I've made many changes in 2018. My resolutions are streamlined. I follow them to the T. I'm noticing positive changes in myself. January was purposelessly busy, though. A lot of pending tasks and catching up kept me occupied. I'll remember January 2018 for two reasons. First - two of the leading actors of Masaan interacted with me after I posted a couplet inspired by the movie on Instagram. And few of my couplets made way to a cafe in Dubai. On writing front, I wrote the following in January -  I was confused which is the right word - sawari or sanwari. The word with 'n' sound is right. Well, so much to learn. Vicky Kaushal and Shweta Tripathi read and commented on this couplet. It's special as this couplet is inspired by their story in the movie. One of the Hindi couplet TheBhukkadCafe shared. Which one is your favorite out of all these?