Skip to main content

यूँ दो चार घंटे के लिए नहीं



फ़ुर्सत में मिलना मुझसे

यूँ दो चार घंटे के लिए नहीं 

सिर्फ़ हाल चाल नहीं पूछना

बातें करनी है तुमसे कई


देखना है तुम्हें एक टक

शिकवे करने है तुमसे कई हज़ार

जब नाराज़ हुए थे तुम मुझसे

और जब छेड़ा था मुझे बीच बाज़ार


चवन्नी-अठन्नी सा ढोंग मत करना

मान लेना मेरे हर कहे को

सुबकियाँ से काम मत चलाना

बेहने देना ग़र आँसू बेहे तो 


सख़्त होने का दिखावा छोड़ आना

नुक्कड़ वाले बनिये की दुकान पे

सिद्दत से एक बार बोल देना 

कि गलती होती है इंसान से


तुम मुझे छोड़ गए

उसका तुम्हें कभी अफ़सोस हुआ है क्या

मैं नहीं तुमसे पूछूँगी 

कि मेरे बाद मेरी तरह किसी को छुआ है क्या 


ना मैं इस युग की मीरा हूँ 

ना हो तुम मेरे घनश्याम

बस इश्क़ है तुमसे बेपन्नह मुझे

बाक़ी सब कुछ है मुझमें आम 


तुम भी सोचते होगे ना 

यह तीली सा इश्क़, ज्वालामुखी कब हुआ

यूँ समझ लो तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे ख़याल ने दिन में 100 बार मुझे छुआ


अब गणित में तो तुम अव्वल हो

हिसाब लगा ही लोगे

पर सोच के आना जनाब 

पिछले 15 सालों का हिसाब कैसे दोगे 


तो आना बस फ़ुरसत में 

यूँ दो चार घंटे के लिए नहीं 

सिर्फ़ हाल चाल नहीं पूछना

बातें करनी है तुमसे कई



Comments

Post a Comment

Bricks, brickbats, applause - say it in comments!